Sunday, January 30, 2011

मकतूल भी गुनहगार था..


संभवत: यह अभूतपूर्व है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी मुकदमे में अपने ही निर्णय को चार दिन के भीतर स्वेच्छा से संशोधित कर लिया हो। ग्राहम स्टेंस हत्याकांड में पिछले सप्ताह दिए फैसले से कोर्ट ने दो पंक्तियां हटा ली हैं। इसका कोई कारण नहीं बताया गया है, किंतु वस्तुत: उन पंक्तियों का महत्व इससे और बढ़ गया है! जागरूक देशभक्त लोगों को इससे सीख लेनी चाहिए कि कैसे मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों की लफ्फाजी देश-समाज के हित पर भारी पड़ती है। समाचारों में यही आया कि शायद तनावपूर्ण मजहबी भावनाओं के आभास से कोर्ट ने स्वयं ही अपना निर्णय संशोधित कर लिया! सच यह है कि अपने पहले निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने पूरा न्याय किया था। अब उन पंक्तियों को हटा देने से निर्णय की न्याय-भावना दुर्बल हुई है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में एक महत्वपूर्ण बात को रेखांकित किया था, जिसका उल्लेख उस कांड के उल्लेख में नहीं किया जाता था। मृत्युदंड देने की अपील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा था कि यह सजा विशेष से विशिष्टतम मामले में ही दी जाती है। स्टेंस कांड वैसा मामला नहीं है, क्योंकि अभियुक्त ने सबक सिखाने की भावना से यह कांड किया था। दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि मृतक द्वारा स्थानीय आदिवासियों का मतांतरण कराना एक अनुचित कार्य था, जिससे सामाजिक आक्रोश पैदा हुआ। दारा सिंह ने उसी भाव में स्टेंस की हत्या की। इसे स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी दबाव या इस झूठे आधार पर किसी का मतांतरण कराना अनुचित है कि एक धर्म दूसरे से श्रेष्ठ है। इस प्रकार, कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट संज्ञान लिया कि यदि सेवा कायरें की आड़ में कोई मिशनरी गरीबों, आदिवासियों का मतांतरण कराता है, तो यह गलत है। ठीक यही बात महात्मा गांधी ने भी कही थी कि ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाया जाने वाला मतांतरण कार्यक्रम अनावश्यक अशांति की जड़ है। उस कांड की न्यायिक जांच करने वाले बधवा आयोग ने पहली बार इस सच्चाई को नोट किया था कि मकतूल ग्राहम स्टेंस ऑस्ट्रेलिया भेजे जाने वाली अपनी रिपोटरें में नियमित रूप से मतांतरण कार्य की प्रगति का उल्लेख करते थे। इसके अलावा कोढ़ पीडि़तों की सेवा के साथ-साथ स्थानीय लोगों का नियमित मतांतरण कराना उनके कायरें में शामिल था। यह नितांत अवैध था क्योंकि उड़ीसा कानून के अनुसार किसी मतांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन को इसकी सूचना देना अनिवार्य है। मिशनरी किसी का मतांतरण कराते हुए यह सूचना कभी नहीं देते और सब कुछ गोपनीय ढंग से संपन्न करते हैं। क्योंकि तब उनकी व्यवस्थित, संगठित मतांतरण परियोजनाओं में दबाव, लोभ आदि अनुचित तरीकों के इस्तेमाल की बात भी उजागर हो सकती है। यह जगजाहिर है कि भारतीय लोग शांति-प्रिय हैं। यहां प्रत्येक धर्म, विश्वास को सदा से सहज आदर मिलता रहा है। भारतीय संविधान सबको पंथिक स्वतंत्रता देता है, जो दुनिया के कई देशों में नहीं। इस स्थिति में भारत के धर्म, विश्वास और समाज पर जान-बूझ कर चोट करना शांतिपूर्ण जनता को भड़काने के सिवा और क्या है? इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ध्यान देकर सराहनीय कार्य किया था। दुर्भाग्य यह कि भारत के राष्ट्रवादी संगठन भी ऐसी घटनाओं की अपेक्षित चिंता नहीं करते। उन्हें दुनिया भर में हिंदू सांप्रदायिक कहकर लांछित किया जाता है। किंतु जब स्टेंस जैसे कांड होते हैं, तो वे अपनी बेगुनाही दिखाने में ही सारी शक्ति लगा देते हैं। जबकि उन्हें राष्ट्रीय होने का परिचय देते हुए साहसपूर्वक कहना चाहिए था कि सारी अशांति की जड़ विदेशी मिशनरियों का मतांतरण अभियान है। दारा सिंह को सजा मिलनी चाहिए, किंतु मिशनरियों का अवैध, अनैतिक और हिंदू-विरोधी धंधा भी बंद होना चाहिए। जब यह कांड हुआ तो इन राष्ट्रवादी संगठनों के लोग ही सत्ता में थे। उन्होंने एक बार भी यह बात नहीं उठाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा। यदि तब सत्ताधारियों ने मिशनरियों को भी कानून की सीमा न तोड़ने की चेतावनी दी होती तो कुछ हो-हल्ले के बावजूद सार्थक बहस होती। देश-हित और सामाजिक सौहार्द की वास्तविक चिंता करने वालों को इस पर खुल कर बोलना चाहिए कि मिशनरियों द्वारा सेवा के नाम पर मतांतरण कराने का छल एक गंभीर अपराध है। न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक रूप से भी। जिस हिंदू समाज ने अतिशय उदारता दिखाते हुए सबको धर्म-प्रचार करने तक का अधिकार दिया है, उसी के धर्म-विश्वास पर छल-प्रपंच से हमला करना अत्यंत घृणित कार्य है। इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए। इसके लिए संविधान-संशोधन करके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को ऐसे व्याख्यायित किया जाना चाहिए ताकि किसी को दूसरों का मनमाना मतांतरण कराने की छूट न मिले। सुप्रीम कोर्ट के संशोधित फैसले में भी यह भावना निहित है। अच्छा हो इसे ठोस कानूनी रूप भी दे दिया जाए। इसी में सबका हित है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)


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