जस्टिस नियोगी की रिपोर्ट को हम नहीं मानते। धर्मातरण विरोधी कानून हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला हैं। डीपी वाधवा आयोग की रिपोर्ट झूठ बोलती है। कंधमाल में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद बनाए गए जस्टिस एससी महापात्रा आयोग की रिपोर्ट दक्षिणपंथी संगठनों के प्रभाव में बनाई गई लगती है। इसलिए यह विचार करने योग्य ही नहीं है। और अब ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो विद्वान न्यायाधीशों द्वारा ग्राहम स्टेंस के काम-काज और मतांतरण पर की गई टिप्पणियों पर भारतीय चर्च द्वारा नराजगी जाहिर करते हुए इसे फैसले से हटाने की मांग की जा रही है। चर्च का तर्क है कि इससे कंधमाल के मामलों पर असर पड़ेगा। भारत का चर्च आज हर उस चीज को नकारने में लगा हुआ है, जो उसके काम-काज पर उंगली उठाती हो। देश भर में मिशनरियों के काम-काज के तरीकों और धर्म-प्रचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई आयोगों और जांच एजेंसियों ने ईसाई समुदाय और बहुसंख्यकों के बीच बढ़ते तनाव को मिशनरियों की मतांतरण जैसी गतिविधियों को जिम्मेवार माना है, लेकिन भारतीय चर्च नेता ऐसी रपटों को सिरे से ही खारिज कर देते हैं। पर हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसके गंभीर मायने हैं और चर्च नेताओं को अब आत्म-मंथन की जरूरत है। ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह को मृत्युदंड दिए जाने की केंद्र सरकार की मांग को नमंजूर करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। दारा सिंह के सहयोगी महेंद्र हेंब्रम को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। अन्य 11 अभियुक्तों को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने इस मामले में मृत्युदंड की मांग की थी। बता दें कि ग्राहम स्टेंस और उनके दो नाबलिग बेटों फिलिप और टिमोथी को उड़ीसा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में 22 जनवरी 1999 को भीड़ ने जिंदा जला दिया था। स्टेंस पिछले तीन दशकों से कुष्ठ रोगियों के साथ काम कर रहे थे। वे कई सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल थे। इसी के साथ क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को लेकर तनाव भी लंबे समय से बरकरार था। क्षेत्र के गैर ईसाइयों का आरोप था कि सामाजिक गतिविधियों की आड़ में वह मतांतरण करवा रहे थे। ग्राहम स्टेंस की हत्या की गंभीरता को देखते हुए एक सप्ताह के भीतर ही केंद्र सरकार ने मामले की जांच के लिए जस्टिस डीपी वधवा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया था। उड़ीसा सरकार ने एक महीने के अंदर स्टेंस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। भारतीय चर्च संगठनों और गैर सरकारी संगठनों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय तूल देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस तरह से स्टेंस और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या की गई थी, मानवता में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसे जायज नहीं ठहरा सकता। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, स्टेंस ने कार से निकलकर भागने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसे भागने नहीं दिया और पिता-पुत्रों को जिंदा ही जला दिया। जस्टिस पी सतशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की बेंच ने सजा सुनाते हुए कहा कि फांसी की सजा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में दी जाती है। और यह प्रत्येक मामले में तथ्यों और हालात पर निर्भर करती है। मौजूदा मामले में जुर्म भले ही कड़ी भर्त्सना के योग्य है। फिर भी यह दुर्लभतम मामले की श्रेणी में नहीं आता है। अत: इसमें फांसी नहीं दी जा सकती। विद्वान न्यायाधीशों ने अपने फैसले में यह भी कहा कि लोग ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाना चाहते थे, क्योंकि वह उनके क्षेत्र में मतांतरण के काम में जुटा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या पर फैसला सुनाते हुए कहा गया कि किसी भी व्यक्ति की आस्था और उसके विश्वास में हस्तक्षेप करना और इसके लिए बल का उपयोग करना, उत्तेजना का प्रयाग करना, लालच का प्रयोग करना या किसी को यह झूठा विश्वास दिलाना कि उनका धर्म दूसरे से अच्छा है और ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति का मतांतरण करना (धर्म बदल देना) किसी भी आधार पर न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के धर्मातरण से हमारे समाज की उस संरचना पर चोट होती है, जिसकी रचना संविधान निर्माताओं ने की थी। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि महात्मा गांधी का जो सपना था कि धर्म राष्ट्र के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगा, वह पूरा होगा..। किसी की आस्था को जबरदस्ती बदलना या फिर यह दलील देना कि एक धर्म दूसरे से बेहतर है, उचित नहीं है। अगर चर्च नेता चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्गदर्शक बन सकता है। चर्च खुद भी यह जानता है कि उसके धर्म प्रचार करने और ईसाइयत को फैलाने का क्या तरीका है? आज मणिपुर, नागालैंड, असम आदि राज्यों में मिशनरियों द्वारा अपना संख्याबल बढ़ाने के नाम पर खूनी खेल खेला जा रहा है। क्षेत्र के एक कैथोलिक बिशप संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर बपटिस्ट मिशनरियों से कैथोलिक ईसाइयों की रक्षा करने की गुहार लगा चुके हैं। गैर ईसाइयों की बात न भी करें तो ईसाई मिशनरियों के अंदर ही अपना संख्याबल बढ़ाने की मारामारी चलती रहती है। हाल ही में मध्य प्रदेश के कैथोलिक और कुछ गैर कैथोलिक चर्चो ने तय किया है कि वह भेड़-चोरी को रोकेंगे और दूसरे मिशनरियों के सदस्यों को अपने साथ नहीं मिलाएंगे। आज चर्च का पूरा जोर अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने पर लगा हुआ है। इस कारण देश के कई राज्यों में ईसाइयों एवं बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। मतांतरण की गतिविधियों के चलते करोड़ों अनुसूचित जाति से ईसाई बने लोगों का जीवन चर्च के अंदर दयनीय हो गया है। चर्च नेता उन्हें अपने ढांचे में अधिकार देने के बदले सरकार से उन्हें पुन: अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। मतांतरित लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के बदले भारतीय चर्च तेजी से अपनी संपदा और संख्या को बढ़ता जा रहा है। चर्च लगातार यह दावा भी करता जा रहा है कि वह देश में लाखों सेवा कार्य चला रहा है, लेकिन उसे इसका भी उतर ढूंढ़ना होगा कि सेवा कार्य चलाने के बावजूद भारतीयों के एक बड़े हिस्से में उसके प्रति इतनी नफरत क्यों है कि 30 सालों तक सेवा कार्य चलाने वाले ग्राहम स्टेंस को एक भीड़ जिंदा जला देती है और उसके पंथ-प्रचारकों के साथ भी टकराव होता रहता है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उत्तर तो चर्च को ही ढूंढ़ना होगा। (लेखक पूअर क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं)
Sunday, January 30, 2011
दारा सिंह, सुप्रीमकोर्ट और भारतीय चर्च
जस्टिस नियोगी की रिपोर्ट को हम नहीं मानते। धर्मातरण विरोधी कानून हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला हैं। डीपी वाधवा आयोग की रिपोर्ट झूठ बोलती है। कंधमाल में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद बनाए गए जस्टिस एससी महापात्रा आयोग की रिपोर्ट दक्षिणपंथी संगठनों के प्रभाव में बनाई गई लगती है। इसलिए यह विचार करने योग्य ही नहीं है। और अब ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो विद्वान न्यायाधीशों द्वारा ग्राहम स्टेंस के काम-काज और मतांतरण पर की गई टिप्पणियों पर भारतीय चर्च द्वारा नराजगी जाहिर करते हुए इसे फैसले से हटाने की मांग की जा रही है। चर्च का तर्क है कि इससे कंधमाल के मामलों पर असर पड़ेगा। भारत का चर्च आज हर उस चीज को नकारने में लगा हुआ है, जो उसके काम-काज पर उंगली उठाती हो। देश भर में मिशनरियों के काम-काज के तरीकों और धर्म-प्रचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई आयोगों और जांच एजेंसियों ने ईसाई समुदाय और बहुसंख्यकों के बीच बढ़ते तनाव को मिशनरियों की मतांतरण जैसी गतिविधियों को जिम्मेवार माना है, लेकिन भारतीय चर्च नेता ऐसी रपटों को सिरे से ही खारिज कर देते हैं। पर हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसके गंभीर मायने हैं और चर्च नेताओं को अब आत्म-मंथन की जरूरत है। ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह को मृत्युदंड दिए जाने की केंद्र सरकार की मांग को नमंजूर करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। दारा सिंह के सहयोगी महेंद्र हेंब्रम को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। अन्य 11 अभियुक्तों को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने इस मामले में मृत्युदंड की मांग की थी। बता दें कि ग्राहम स्टेंस और उनके दो नाबलिग बेटों फिलिप और टिमोथी को उड़ीसा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में 22 जनवरी 1999 को भीड़ ने जिंदा जला दिया था। स्टेंस पिछले तीन दशकों से कुष्ठ रोगियों के साथ काम कर रहे थे। वे कई सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल थे। इसी के साथ क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को लेकर तनाव भी लंबे समय से बरकरार था। क्षेत्र के गैर ईसाइयों का आरोप था कि सामाजिक गतिविधियों की आड़ में वह मतांतरण करवा रहे थे। ग्राहम स्टेंस की हत्या की गंभीरता को देखते हुए एक सप्ताह के भीतर ही केंद्र सरकार ने मामले की जांच के लिए जस्टिस डीपी वधवा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया था। उड़ीसा सरकार ने एक महीने के अंदर स्टेंस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। भारतीय चर्च संगठनों और गैर सरकारी संगठनों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय तूल देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस तरह से स्टेंस और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या की गई थी, मानवता में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसे जायज नहीं ठहरा सकता। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, स्टेंस ने कार से निकलकर भागने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसे भागने नहीं दिया और पिता-पुत्रों को जिंदा ही जला दिया। जस्टिस पी सतशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की बेंच ने सजा सुनाते हुए कहा कि फांसी की सजा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में दी जाती है। और यह प्रत्येक मामले में तथ्यों और हालात पर निर्भर करती है। मौजूदा मामले में जुर्म भले ही कड़ी भर्त्सना के योग्य है। फिर भी यह दुर्लभतम मामले की श्रेणी में नहीं आता है। अत: इसमें फांसी नहीं दी जा सकती। विद्वान न्यायाधीशों ने अपने फैसले में यह भी कहा कि लोग ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाना चाहते थे, क्योंकि वह उनके क्षेत्र में मतांतरण के काम में जुटा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या पर फैसला सुनाते हुए कहा गया कि किसी भी व्यक्ति की आस्था और उसके विश्वास में हस्तक्षेप करना और इसके लिए बल का उपयोग करना, उत्तेजना का प्रयाग करना, लालच का प्रयोग करना या किसी को यह झूठा विश्वास दिलाना कि उनका धर्म दूसरे से अच्छा है और ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति का मतांतरण करना (धर्म बदल देना) किसी भी आधार पर न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के धर्मातरण से हमारे समाज की उस संरचना पर चोट होती है, जिसकी रचना संविधान निर्माताओं ने की थी। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि महात्मा गांधी का जो सपना था कि धर्म राष्ट्र के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगा, वह पूरा होगा..। किसी की आस्था को जबरदस्ती बदलना या फिर यह दलील देना कि एक धर्म दूसरे से बेहतर है, उचित नहीं है। अगर चर्च नेता चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्गदर्शक बन सकता है। चर्च खुद भी यह जानता है कि उसके धर्म प्रचार करने और ईसाइयत को फैलाने का क्या तरीका है? आज मणिपुर, नागालैंड, असम आदि राज्यों में मिशनरियों द्वारा अपना संख्याबल बढ़ाने के नाम पर खूनी खेल खेला जा रहा है। क्षेत्र के एक कैथोलिक बिशप संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर बपटिस्ट मिशनरियों से कैथोलिक ईसाइयों की रक्षा करने की गुहार लगा चुके हैं। गैर ईसाइयों की बात न भी करें तो ईसाई मिशनरियों के अंदर ही अपना संख्याबल बढ़ाने की मारामारी चलती रहती है। हाल ही में मध्य प्रदेश के कैथोलिक और कुछ गैर कैथोलिक चर्चो ने तय किया है कि वह भेड़-चोरी को रोकेंगे और दूसरे मिशनरियों के सदस्यों को अपने साथ नहीं मिलाएंगे। आज चर्च का पूरा जोर अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने पर लगा हुआ है। इस कारण देश के कई राज्यों में ईसाइयों एवं बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। मतांतरण की गतिविधियों के चलते करोड़ों अनुसूचित जाति से ईसाई बने लोगों का जीवन चर्च के अंदर दयनीय हो गया है। चर्च नेता उन्हें अपने ढांचे में अधिकार देने के बदले सरकार से उन्हें पुन: अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। मतांतरित लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के बदले भारतीय चर्च तेजी से अपनी संपदा और संख्या को बढ़ता जा रहा है। चर्च लगातार यह दावा भी करता जा रहा है कि वह देश में लाखों सेवा कार्य चला रहा है, लेकिन उसे इसका भी उतर ढूंढ़ना होगा कि सेवा कार्य चलाने के बावजूद भारतीयों के एक बड़े हिस्से में उसके प्रति इतनी नफरत क्यों है कि 30 सालों तक सेवा कार्य चलाने वाले ग्राहम स्टेंस को एक भीड़ जिंदा जला देती है और उसके पंथ-प्रचारकों के साथ भी टकराव होता रहता है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उत्तर तो चर्च को ही ढूंढ़ना होगा। (लेखक पूअर क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं)
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment