ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि 11 सितम्बर 2001 के आत्मघाती हमलों के बाद से इस्लाम की छवि बिगड़ने के बावजूद ब्रिटेन में अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल करने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन में हर साल लगभग 5200 लोग इस्लाम धर्म कबूल कर रहे हैं। 2001 तक उनकी संख्या 60,669 थी जो पिछले साल बढ़कर एक लाख से ऊपर जा चुकी है। ब्रिटेन की इस्लामी चिंतन संस्था ‘फेथ मैटर्स’ के लिए स्वांजी विविद्यालय के कुलसचिव केविन ब्राइस द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटन के गोरे समुदाय की युवतियां विशेष रूप से इस्लाम की तरफ आकर्षित हो रही हैं और इस्लाम कबूल करने के बाद वे अपना पश्चिमी पहनावा छोड़ कर जिल्बाब और हिजाब पहनना पसंद करती हैं। सर्वेक्षण के अनुसार इस्लाम कबूल करने वाले युवाओं की औसत उम्र साढ़े सत्ताइस साल है जिनमें से 56 प्रतिशत युवक और 62 प्रतिशत युवतियां हैं। हाल में इस्लाम कबूल करने वाली इन गोरी युवतियों में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की साली लौरेन बूथ भी शामिल हैं जिन्होंने पिछले ही साल ईरान के शिया तीर्थ कुम में फातिमा अल-मासूमा की दरगाह पर मिली आध्यात्मिक प्रेरणा के बाद इस्लाम कबूल कर लिया था। ब्रिटेन के संडे टाइम्स, डेली मेल और न्यू स्टेट्समैन जैसे अखबारों में लिखने और बीबीसी और स्काई न्यूज जैसे टेलीविजन चैनलों के लिए टिप्पणी करने वाली लौरेन बूथ आजकल ईरान के प्रेस टीवी के लिए काम करती हैं। वह बाकायदा हिजाब पहनती हैं और पांच बार की नमाज भी पढ़ती हैं। गौररतलब है कि यहूदी मां पामेला स्मिथ की बेटी और ईसाई अभिनेता क्रेग डार्बी की पत्नी होने के बावजूद लौरेन बूथ का कई बरसों से इस्लाम की ओर झुकाव रहा है। उन्होंने गजा में फिलिस्तीनियों की यातना को अनुभव किया है और वे इराक युद्ध की मुखर विरोधी भी रही हैं। सर्वेक्षणकर्ताओं का कहना है कि आम तौर पर गोरी युवतियां अपने परिवारों की मूल्यहीनता और बिखराव से उकता कर इस्लाम के सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों की ओर आकृष्ट हो रही हैं। इसलिए ये उस इस्लामी पहनावे और बर्ताव को स्वेच्छा से अपना रही हैं जिसे पश्चिमी समाज नारी के बंधन और अपमान के रूप में देखता आया है। सर्वेक्षण के आधार पर जारी की गई रिपोर्ट ‘ए माइनोरिटी विदिन माइनोरिटी’ के अनुसार इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि अंग्रेज युवतियां मुसलमान युवकों से शादी करने के लिए इस्लाम कबूल कर रही हैं। इस्लाम कबूल करने वालों में से अधिकांश को मस्जिदों से भी कोई खास मदद नहीं मिल रही है और अधिकांश को अपने परिवारों और समाज का भारी तिरस्कार और संदेह भी झेलना पड़ रहा है। फिर भी इंटरनेट, मित्रों और किताबों के सहारे उत्तरोत्तर बड़ी संख्या में युवक और युवतियां इस्लाम की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। इसका कारण स्पष्ट करते हुए सर्वेक्षण कराने वाली संस्था फेथ मैटर्स के निदेशक फयाज मुगल का कहना है- ‘मेरा मानना है कि बढ़ते धर्मांतरण और इस्लाम के बराबर मीडिया में छाए रहने के बीच निश्चित रूप से एक संबंध है। लोग जानना चाहते हैं कि इस्लाम आखिर क्या है और जब वे इसके बारे में जान जाते हैं तो उनमें से अधिकांश तो कंधे झटक कर फिर से अपनी जिंदगी में डूब जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें इस्लाम पसंद आता है और वे सीधे धर्मांतरण का रास्ता अपना लेते हैं’
स्वांजी विविद्यालय के कुलसचिव केविन ब्राइस ने इस सर्वेक्षण के लिए ब्रिटेन की 250 मस्जिदों के सर्वेक्षण और 2001 की जनगणना के आंकड़े जैसे कई स्रेतों का सहारा लिया है और इस्लाम कबूल करने वाले लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों का आकलन करने के लिए 120 गोरी महिलाओं से बातचीत की है। इनमें से अधिकांश हिजाब पहनती हैं लेकिन बुर्के के खिलाफ हैं। इस्लाम कबूल करने वालों में से अधिकांश का मानना है कि ब्रिटिश जीवन शैली में बुराइयों की अपेक्षा अच्छाइयां ज्यादा हैं और वे मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच गलतफहिमयां दूर करने के लिए एक पुल का काम कर सकते हैं।
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