जस्टिस नियोगी की रिपोर्ट को हम नहीं मानते। धर्मातरण विरोधी कानून हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला हैं। डीपी वाधवा आयोग की रिपोर्ट झूठ बोलती है। कंधमाल में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद बनाए गए जस्टिस एससी महापात्रा आयोग की रिपोर्ट दक्षिणपंथी संगठनों के प्रभाव में बनाई गई लगती है। इसलिए यह विचार करने योग्य ही नहीं है। और अब ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो विद्वान न्यायाधीशों द्वारा ग्राहम स्टेंस के काम-काज और मतांतरण पर की गई टिप्पणियों पर भारतीय चर्च द्वारा नराजगी जाहिर करते हुए इसे फैसले से हटाने की मांग की जा रही है। चर्च का तर्क है कि इससे कंधमाल के मामलों पर असर पड़ेगा। भारत का चर्च आज हर उस चीज को नकारने में लगा हुआ है, जो उसके काम-काज पर उंगली उठाती हो। देश भर में मिशनरियों के काम-काज के तरीकों और धर्म-प्रचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई आयोगों और जांच एजेंसियों ने ईसाई समुदाय और बहुसंख्यकों के बीच बढ़ते तनाव को मिशनरियों की मतांतरण जैसी गतिविधियों को जिम्मेवार माना है, लेकिन भारतीय चर्च नेता ऐसी रपटों को सिरे से ही खारिज कर देते हैं। पर हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसके गंभीर मायने हैं और चर्च नेताओं को अब आत्म-मंथन की जरूरत है। ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह को मृत्युदंड दिए जाने की केंद्र सरकार की मांग को नमंजूर करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। दारा सिंह के सहयोगी महेंद्र हेंब्रम को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। अन्य 11 अभियुक्तों को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने इस मामले में मृत्युदंड की मांग की थी। बता दें कि ग्राहम स्टेंस और उनके दो नाबलिग बेटों फिलिप और टिमोथी को उड़ीसा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में 22 जनवरी 1999 को भीड़ ने जिंदा जला दिया था। स्टेंस पिछले तीन दशकों से कुष्ठ रोगियों के साथ काम कर रहे थे। वे कई सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल थे। इसी के साथ क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को लेकर तनाव भी लंबे समय से बरकरार था। क्षेत्र के गैर ईसाइयों का आरोप था कि सामाजिक गतिविधियों की आड़ में वह मतांतरण करवा रहे थे। ग्राहम स्टेंस की हत्या की गंभीरता को देखते हुए एक सप्ताह के भीतर ही केंद्र सरकार ने मामले की जांच के लिए जस्टिस डीपी वधवा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया था। उड़ीसा सरकार ने एक महीने के अंदर स्टेंस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। भारतीय चर्च संगठनों और गैर सरकारी संगठनों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय तूल देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस तरह से स्टेंस और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या की गई थी, मानवता में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसे जायज नहीं ठहरा सकता। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, स्टेंस ने कार से निकलकर भागने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसे भागने नहीं दिया और पिता-पुत्रों को जिंदा ही जला दिया। जस्टिस पी सतशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की बेंच ने सजा सुनाते हुए कहा कि फांसी की सजा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में दी जाती है। और यह प्रत्येक मामले में तथ्यों और हालात पर निर्भर करती है। मौजूदा मामले में जुर्म भले ही कड़ी भर्त्सना के योग्य है। फिर भी यह दुर्लभतम मामले की श्रेणी में नहीं आता है। अत: इसमें फांसी नहीं दी जा सकती। विद्वान न्यायाधीशों ने अपने फैसले में यह भी कहा कि लोग ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाना चाहते थे, क्योंकि वह उनके क्षेत्र में मतांतरण के काम में जुटा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या पर फैसला सुनाते हुए कहा गया कि किसी भी व्यक्ति की आस्था और उसके विश्वास में हस्तक्षेप करना और इसके लिए बल का उपयोग करना, उत्तेजना का प्रयाग करना, लालच का प्रयोग करना या किसी को यह झूठा विश्वास दिलाना कि उनका धर्म दूसरे से अच्छा है और ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति का मतांतरण करना (धर्म बदल देना) किसी भी आधार पर न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के धर्मातरण से हमारे समाज की उस संरचना पर चोट होती है, जिसकी रचना संविधान निर्माताओं ने की थी। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि महात्मा गांधी का जो सपना था कि धर्म राष्ट्र के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगा, वह पूरा होगा..। किसी की आस्था को जबरदस्ती बदलना या फिर यह दलील देना कि एक धर्म दूसरे से बेहतर है, उचित नहीं है। अगर चर्च नेता चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्गदर्शक बन सकता है। चर्च खुद भी यह जानता है कि उसके धर्म प्रचार करने और ईसाइयत को फैलाने का क्या तरीका है? आज मणिपुर, नागालैंड, असम आदि राज्यों में मिशनरियों द्वारा अपना संख्याबल बढ़ाने के नाम पर खूनी खेल खेला जा रहा है। क्षेत्र के एक कैथोलिक बिशप संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर बपटिस्ट मिशनरियों से कैथोलिक ईसाइयों की रक्षा करने की गुहार लगा चुके हैं। गैर ईसाइयों की बात न भी करें तो ईसाई मिशनरियों के अंदर ही अपना संख्याबल बढ़ाने की मारामारी चलती रहती है। हाल ही में मध्य प्रदेश के कैथोलिक और कुछ गैर कैथोलिक चर्चो ने तय किया है कि वह भेड़-चोरी को रोकेंगे और दूसरे मिशनरियों के सदस्यों को अपने साथ नहीं मिलाएंगे। आज चर्च का पूरा जोर अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने पर लगा हुआ है। इस कारण देश के कई राज्यों में ईसाइयों एवं बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। मतांतरण की गतिविधियों के चलते करोड़ों अनुसूचित जाति से ईसाई बने लोगों का जीवन चर्च के अंदर दयनीय हो गया है। चर्च नेता उन्हें अपने ढांचे में अधिकार देने के बदले सरकार से उन्हें पुन: अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। मतांतरित लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के बदले भारतीय चर्च तेजी से अपनी संपदा और संख्या को बढ़ता जा रहा है। चर्च लगातार यह दावा भी करता जा रहा है कि वह देश में लाखों सेवा कार्य चला रहा है, लेकिन उसे इसका भी उतर ढूंढ़ना होगा कि सेवा कार्य चलाने के बावजूद भारतीयों के एक बड़े हिस्से में उसके प्रति इतनी नफरत क्यों है कि 30 सालों तक सेवा कार्य चलाने वाले ग्राहम स्टेंस को एक भीड़ जिंदा जला देती है और उसके पंथ-प्रचारकों के साथ भी टकराव होता रहता है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उत्तर तो चर्च को ही ढूंढ़ना होगा। (लेखक पूअर क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं)
Sunday, January 30, 2011
दारा सिंह, सुप्रीमकोर्ट और भारतीय चर्च
जस्टिस नियोगी की रिपोर्ट को हम नहीं मानते। धर्मातरण विरोधी कानून हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला हैं। डीपी वाधवा आयोग की रिपोर्ट झूठ बोलती है। कंधमाल में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद बनाए गए जस्टिस एससी महापात्रा आयोग की रिपोर्ट दक्षिणपंथी संगठनों के प्रभाव में बनाई गई लगती है। इसलिए यह विचार करने योग्य ही नहीं है। और अब ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो विद्वान न्यायाधीशों द्वारा ग्राहम स्टेंस के काम-काज और मतांतरण पर की गई टिप्पणियों पर भारतीय चर्च द्वारा नराजगी जाहिर करते हुए इसे फैसले से हटाने की मांग की जा रही है। चर्च का तर्क है कि इससे कंधमाल के मामलों पर असर पड़ेगा। भारत का चर्च आज हर उस चीज को नकारने में लगा हुआ है, जो उसके काम-काज पर उंगली उठाती हो। देश भर में मिशनरियों के काम-काज के तरीकों और धर्म-प्रचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई आयोगों और जांच एजेंसियों ने ईसाई समुदाय और बहुसंख्यकों के बीच बढ़ते तनाव को मिशनरियों की मतांतरण जैसी गतिविधियों को जिम्मेवार माना है, लेकिन भारतीय चर्च नेता ऐसी रपटों को सिरे से ही खारिज कर देते हैं। पर हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसके गंभीर मायने हैं और चर्च नेताओं को अब आत्म-मंथन की जरूरत है। ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह को मृत्युदंड दिए जाने की केंद्र सरकार की मांग को नमंजूर करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। दारा सिंह के सहयोगी महेंद्र हेंब्रम को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। अन्य 11 अभियुक्तों को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने इस मामले में मृत्युदंड की मांग की थी। बता दें कि ग्राहम स्टेंस और उनके दो नाबलिग बेटों फिलिप और टिमोथी को उड़ीसा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में 22 जनवरी 1999 को भीड़ ने जिंदा जला दिया था। स्टेंस पिछले तीन दशकों से कुष्ठ रोगियों के साथ काम कर रहे थे। वे कई सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल थे। इसी के साथ क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को लेकर तनाव भी लंबे समय से बरकरार था। क्षेत्र के गैर ईसाइयों का आरोप था कि सामाजिक गतिविधियों की आड़ में वह मतांतरण करवा रहे थे। ग्राहम स्टेंस की हत्या की गंभीरता को देखते हुए एक सप्ताह के भीतर ही केंद्र सरकार ने मामले की जांच के लिए जस्टिस डीपी वधवा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया था। उड़ीसा सरकार ने एक महीने के अंदर स्टेंस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। भारतीय चर्च संगठनों और गैर सरकारी संगठनों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय तूल देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस तरह से स्टेंस और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या की गई थी, मानवता में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसे जायज नहीं ठहरा सकता। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, स्टेंस ने कार से निकलकर भागने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसे भागने नहीं दिया और पिता-पुत्रों को जिंदा ही जला दिया। जस्टिस पी सतशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की बेंच ने सजा सुनाते हुए कहा कि फांसी की सजा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में दी जाती है। और यह प्रत्येक मामले में तथ्यों और हालात पर निर्भर करती है। मौजूदा मामले में जुर्म भले ही कड़ी भर्त्सना के योग्य है। फिर भी यह दुर्लभतम मामले की श्रेणी में नहीं आता है। अत: इसमें फांसी नहीं दी जा सकती। विद्वान न्यायाधीशों ने अपने फैसले में यह भी कहा कि लोग ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाना चाहते थे, क्योंकि वह उनके क्षेत्र में मतांतरण के काम में जुटा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या पर फैसला सुनाते हुए कहा गया कि किसी भी व्यक्ति की आस्था और उसके विश्वास में हस्तक्षेप करना और इसके लिए बल का उपयोग करना, उत्तेजना का प्रयाग करना, लालच का प्रयोग करना या किसी को यह झूठा विश्वास दिलाना कि उनका धर्म दूसरे से अच्छा है और ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति का मतांतरण करना (धर्म बदल देना) किसी भी आधार पर न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के धर्मातरण से हमारे समाज की उस संरचना पर चोट होती है, जिसकी रचना संविधान निर्माताओं ने की थी। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि महात्मा गांधी का जो सपना था कि धर्म राष्ट्र के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगा, वह पूरा होगा..। किसी की आस्था को जबरदस्ती बदलना या फिर यह दलील देना कि एक धर्म दूसरे से बेहतर है, उचित नहीं है। अगर चर्च नेता चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्गदर्शक बन सकता है। चर्च खुद भी यह जानता है कि उसके धर्म प्रचार करने और ईसाइयत को फैलाने का क्या तरीका है? आज मणिपुर, नागालैंड, असम आदि राज्यों में मिशनरियों द्वारा अपना संख्याबल बढ़ाने के नाम पर खूनी खेल खेला जा रहा है। क्षेत्र के एक कैथोलिक बिशप संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर बपटिस्ट मिशनरियों से कैथोलिक ईसाइयों की रक्षा करने की गुहार लगा चुके हैं। गैर ईसाइयों की बात न भी करें तो ईसाई मिशनरियों के अंदर ही अपना संख्याबल बढ़ाने की मारामारी चलती रहती है। हाल ही में मध्य प्रदेश के कैथोलिक और कुछ गैर कैथोलिक चर्चो ने तय किया है कि वह भेड़-चोरी को रोकेंगे और दूसरे मिशनरियों के सदस्यों को अपने साथ नहीं मिलाएंगे। आज चर्च का पूरा जोर अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने पर लगा हुआ है। इस कारण देश के कई राज्यों में ईसाइयों एवं बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। मतांतरण की गतिविधियों के चलते करोड़ों अनुसूचित जाति से ईसाई बने लोगों का जीवन चर्च के अंदर दयनीय हो गया है। चर्च नेता उन्हें अपने ढांचे में अधिकार देने के बदले सरकार से उन्हें पुन: अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। मतांतरित लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के बदले भारतीय चर्च तेजी से अपनी संपदा और संख्या को बढ़ता जा रहा है। चर्च लगातार यह दावा भी करता जा रहा है कि वह देश में लाखों सेवा कार्य चला रहा है, लेकिन उसे इसका भी उतर ढूंढ़ना होगा कि सेवा कार्य चलाने के बावजूद भारतीयों के एक बड़े हिस्से में उसके प्रति इतनी नफरत क्यों है कि 30 सालों तक सेवा कार्य चलाने वाले ग्राहम स्टेंस को एक भीड़ जिंदा जला देती है और उसके पंथ-प्रचारकों के साथ भी टकराव होता रहता है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उत्तर तो चर्च को ही ढूंढ़ना होगा। (लेखक पूअर क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं)
मकतूल भी गुनहगार था..
संभवत: यह अभूतपूर्व है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी मुकदमे में अपने ही निर्णय को चार दिन के भीतर स्वेच्छा से संशोधित कर लिया हो। ग्राहम स्टेंस हत्याकांड में पिछले सप्ताह दिए फैसले से कोर्ट ने दो पंक्तियां हटा ली हैं। इसका कोई कारण नहीं बताया गया है, किंतु वस्तुत: उन पंक्तियों का महत्व इससे और बढ़ गया है! जागरूक देशभक्त लोगों को इससे सीख लेनी चाहिए कि कैसे मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों की लफ्फाजी देश-समाज के हित पर भारी पड़ती है। समाचारों में यही आया कि शायद तनावपूर्ण मजहबी भावनाओं के आभास से कोर्ट ने स्वयं ही अपना निर्णय संशोधित कर लिया! सच यह है कि अपने पहले निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने पूरा न्याय किया था। अब उन पंक्तियों को हटा देने से निर्णय की न्याय-भावना दुर्बल हुई है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में एक महत्वपूर्ण बात को रेखांकित किया था, जिसका उल्लेख उस कांड के उल्लेख में नहीं किया जाता था। मृत्युदंड देने की अपील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा था कि यह सजा विशेष से विशिष्टतम मामले में ही दी जाती है। स्टेंस कांड वैसा मामला नहीं है, क्योंकि अभियुक्त ने सबक सिखाने की भावना से यह कांड किया था। दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि मृतक द्वारा स्थानीय आदिवासियों का मतांतरण कराना एक अनुचित कार्य था, जिससे सामाजिक आक्रोश पैदा हुआ। दारा सिंह ने उसी भाव में स्टेंस की हत्या की। इसे स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी दबाव या इस झूठे आधार पर किसी का मतांतरण कराना अनुचित है कि एक धर्म दूसरे से श्रेष्ठ है। इस प्रकार, कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट संज्ञान लिया कि यदि सेवा कायरें की आड़ में कोई मिशनरी गरीबों, आदिवासियों का मतांतरण कराता है, तो यह गलत है। ठीक यही बात महात्मा गांधी ने भी कही थी कि ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाया जाने वाला मतांतरण कार्यक्रम अनावश्यक अशांति की जड़ है। उस कांड की न्यायिक जांच करने वाले बधवा आयोग ने पहली बार इस सच्चाई को नोट किया था कि मकतूल ग्राहम स्टेंस ऑस्ट्रेलिया भेजे जाने वाली अपनी रिपोटरें में नियमित रूप से मतांतरण कार्य की प्रगति का उल्लेख करते थे। इसके अलावा कोढ़ पीडि़तों की सेवा के साथ-साथ स्थानीय लोगों का नियमित मतांतरण कराना उनके कायरें में शामिल था। यह नितांत अवैध था क्योंकि उड़ीसा कानून के अनुसार किसी मतांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन को इसकी सूचना देना अनिवार्य है। मिशनरी किसी का मतांतरण कराते हुए यह सूचना कभी नहीं देते और सब कुछ गोपनीय ढंग से संपन्न करते हैं। क्योंकि तब उनकी व्यवस्थित, संगठित मतांतरण परियोजनाओं में दबाव, लोभ आदि अनुचित तरीकों के इस्तेमाल की बात भी उजागर हो सकती है। यह जगजाहिर है कि भारतीय लोग शांति-प्रिय हैं। यहां प्रत्येक धर्म, विश्वास को सदा से सहज आदर मिलता रहा है। भारतीय संविधान सबको पंथिक स्वतंत्रता देता है, जो दुनिया के कई देशों में नहीं। इस स्थिति में भारत के धर्म, विश्वास और समाज पर जान-बूझ कर चोट करना शांतिपूर्ण जनता को भड़काने के सिवा और क्या है? इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ध्यान देकर सराहनीय कार्य किया था। दुर्भाग्य यह कि भारत के राष्ट्रवादी संगठन भी ऐसी घटनाओं की अपेक्षित चिंता नहीं करते। उन्हें दुनिया भर में हिंदू सांप्रदायिक कहकर लांछित किया जाता है। किंतु जब स्टेंस जैसे कांड होते हैं, तो वे अपनी बेगुनाही दिखाने में ही सारी शक्ति लगा देते हैं। जबकि उन्हें राष्ट्रीय होने का परिचय देते हुए साहसपूर्वक कहना चाहिए था कि सारी अशांति की जड़ विदेशी मिशनरियों का मतांतरण अभियान है। दारा सिंह को सजा मिलनी चाहिए, किंतु मिशनरियों का अवैध, अनैतिक और हिंदू-विरोधी धंधा भी बंद होना चाहिए। जब यह कांड हुआ तो इन राष्ट्रवादी संगठनों के लोग ही सत्ता में थे। उन्होंने एक बार भी यह बात नहीं उठाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा। यदि तब सत्ताधारियों ने मिशनरियों को भी कानून की सीमा न तोड़ने की चेतावनी दी होती तो कुछ हो-हल्ले के बावजूद सार्थक बहस होती। देश-हित और सामाजिक सौहार्द की वास्तविक चिंता करने वालों को इस पर खुल कर बोलना चाहिए कि मिशनरियों द्वारा सेवा के नाम पर मतांतरण कराने का छल एक गंभीर अपराध है। न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक रूप से भी। जिस हिंदू समाज ने अतिशय उदारता दिखाते हुए सबको धर्म-प्रचार करने तक का अधिकार दिया है, उसी के धर्म-विश्वास पर छल-प्रपंच से हमला करना अत्यंत घृणित कार्य है। इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए। इसके लिए संविधान-संशोधन करके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को ऐसे व्याख्यायित किया जाना चाहिए ताकि किसी को दूसरों का मनमाना मतांतरण कराने की छूट न मिले। सुप्रीम कोर्ट के संशोधित फैसले में भी यह भावना निहित है। अच्छा हो इसे ठोस कानूनी रूप भी दे दिया जाए। इसी में सबका हित है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Saturday, January 15, 2011
Friday, January 14, 2011
ब्रिटेन के युवाओं का इस्लाम प्रेम
ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि 11 सितम्बर 2001 के आत्मघाती हमलों के बाद से इस्लाम की छवि बिगड़ने के बावजूद ब्रिटेन में अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल करने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन में हर साल लगभग 5200 लोग इस्लाम धर्म कबूल कर रहे हैं। 2001 तक उनकी संख्या 60,669 थी जो पिछले साल बढ़कर एक लाख से ऊपर जा चुकी है। ब्रिटेन की इस्लामी चिंतन संस्था ‘फेथ मैटर्स’ के लिए स्वांजी विविद्यालय के कुलसचिव केविन ब्राइस द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटन के गोरे समुदाय की युवतियां विशेष रूप से इस्लाम की तरफ आकर्षित हो रही हैं और इस्लाम कबूल करने के बाद वे अपना पश्चिमी पहनावा छोड़ कर जिल्बाब और हिजाब पहनना पसंद करती हैं। सर्वेक्षण के अनुसार इस्लाम कबूल करने वाले युवाओं की औसत उम्र साढ़े सत्ताइस साल है जिनमें से 56 प्रतिशत युवक और 62 प्रतिशत युवतियां हैं। हाल में इस्लाम कबूल करने वाली इन गोरी युवतियों में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की साली लौरेन बूथ भी शामिल हैं जिन्होंने पिछले ही साल ईरान के शिया तीर्थ कुम में फातिमा अल-मासूमा की दरगाह पर मिली आध्यात्मिक प्रेरणा के बाद इस्लाम कबूल कर लिया था। ब्रिटेन के संडे टाइम्स, डेली मेल और न्यू स्टेट्समैन जैसे अखबारों में लिखने और बीबीसी और स्काई न्यूज जैसे टेलीविजन चैनलों के लिए टिप्पणी करने वाली लौरेन बूथ आजकल ईरान के प्रेस टीवी के लिए काम करती हैं। वह बाकायदा हिजाब पहनती हैं और पांच बार की नमाज भी पढ़ती हैं। गौररतलब है कि यहूदी मां पामेला स्मिथ की बेटी और ईसाई अभिनेता क्रेग डार्बी की पत्नी होने के बावजूद लौरेन बूथ का कई बरसों से इस्लाम की ओर झुकाव रहा है। उन्होंने गजा में फिलिस्तीनियों की यातना को अनुभव किया है और वे इराक युद्ध की मुखर विरोधी भी रही हैं। सर्वेक्षणकर्ताओं का कहना है कि आम तौर पर गोरी युवतियां अपने परिवारों की मूल्यहीनता और बिखराव से उकता कर इस्लाम के सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों की ओर आकृष्ट हो रही हैं। इसलिए ये उस इस्लामी पहनावे और बर्ताव को स्वेच्छा से अपना रही हैं जिसे पश्चिमी समाज नारी के बंधन और अपमान के रूप में देखता आया है। सर्वेक्षण के आधार पर जारी की गई रिपोर्ट ‘ए माइनोरिटी विदिन माइनोरिटी’ के अनुसार इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि अंग्रेज युवतियां मुसलमान युवकों से शादी करने के लिए इस्लाम कबूल कर रही हैं। इस्लाम कबूल करने वालों में से अधिकांश को मस्जिदों से भी कोई खास मदद नहीं मिल रही है और अधिकांश को अपने परिवारों और समाज का भारी तिरस्कार और संदेह भी झेलना पड़ रहा है। फिर भी इंटरनेट, मित्रों और किताबों के सहारे उत्तरोत्तर बड़ी संख्या में युवक और युवतियां इस्लाम की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। इसका कारण स्पष्ट करते हुए सर्वेक्षण कराने वाली संस्था फेथ मैटर्स के निदेशक फयाज मुगल का कहना है- ‘मेरा मानना है कि बढ़ते धर्मांतरण और इस्लाम के बराबर मीडिया में छाए रहने के बीच निश्चित रूप से एक संबंध है। लोग जानना चाहते हैं कि इस्लाम आखिर क्या है और जब वे इसके बारे में जान जाते हैं तो उनमें से अधिकांश तो कंधे झटक कर फिर से अपनी जिंदगी में डूब जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें इस्लाम पसंद आता है और वे सीधे धर्मांतरण का रास्ता अपना लेते हैं’
स्वांजी विविद्यालय के कुलसचिव केविन ब्राइस ने इस सर्वेक्षण के लिए ब्रिटेन की 250 मस्जिदों के सर्वेक्षण और 2001 की जनगणना के आंकड़े जैसे कई स्रेतों का सहारा लिया है और इस्लाम कबूल करने वाले लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों का आकलन करने के लिए 120 गोरी महिलाओं से बातचीत की है। इनमें से अधिकांश हिजाब पहनती हैं लेकिन बुर्के के खिलाफ हैं। इस्लाम कबूल करने वालों में से अधिकांश का मानना है कि ब्रिटिश जीवन शैली में बुराइयों की अपेक्षा अच्छाइयां ज्यादा हैं और वे मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच गलतफहिमयां दूर करने के लिए एक पुल का काम कर सकते हैं।
स्वांजी विविद्यालय के कुलसचिव केविन ब्राइस ने इस सर्वेक्षण के लिए ब्रिटेन की 250 मस्जिदों के सर्वेक्षण और 2001 की जनगणना के आंकड़े जैसे कई स्रेतों का सहारा लिया है और इस्लाम कबूल करने वाले लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों का आकलन करने के लिए 120 गोरी महिलाओं से बातचीत की है। इनमें से अधिकांश हिजाब पहनती हैं लेकिन बुर्के के खिलाफ हैं। इस्लाम कबूल करने वालों में से अधिकांश का मानना है कि ब्रिटिश जीवन शैली में बुराइयों की अपेक्षा अच्छाइयां ज्यादा हैं और वे मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच गलतफहिमयां दूर करने के लिए एक पुल का काम कर सकते हैं।
Sunday, January 2, 2011
ईसाइयों की रक्षा के लिए पोप ने लगाई गुहार
अमेरिका व यूरोप के बाद अब अफ्रीका महाद्वीप में भी ईसाई धर्मावलंबियों पर इस्लामी चरमपंथियों के हमले तेज होते जा रहे हैं। मिस्र में चर्च पर हुए आत्मघाती हमले में 21 लोगों की मौत हो गई है, जबकि करीब 80 घायल हुए। इन हमलों के बाद देश में मुस्लिम-ईसाई दंगे भड़क गए हैं। इससे चिंतित पोप बेनेडिक्ट16वें ने दुनियाभर के नेताओं से ईसाइयों की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने की अपील की है। वेटिकन सिटी में नववर्ष के मौके पर एकत्रित हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पोप बेनेडिक्ट ने यह बात कही। मिस्र में ईसाइयों पर हुए आतंकी हमले का जिक्र करते हुए पोप ने कहा कि मानवता से बड़ा धर्म है और हमें हर हाल में इसकी रक्षा करनी होगी। दूसरी ओर मिस्र गृह मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि यह हमला मिस्र के दूसरे सबसे बड़े शहर एलेक्जेंड्रिया के चर्च में हुआ। खाड़ी देशों में सबसे बड़ी ईसाई आबादी मिस्र में ही है। हमले की जिम्मेदारी किसी संगठन ने नहीं ली, लेकिन इसके अल-कायदा की इराक शाखा का हाथ बताया जा रहा है। उसने दो महीने पहले मिस्र के ईसाइयों पर हमले की धमकी दी थी। अमेरिकी समाचार पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, अगर इस हमले के पीछे अल कायदा के हाथ की पुष्टि होती है तो यह बहुत गंभीर बात है। अल कायदा इराक में पहले ही ईसाइयों पर हमले कर रहा है। इससे अन्य देशों में भी ईसाइयों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। जानकारों का कहना है कि मिस्र में मुस्लिम-ईसाई दंगे नई बात नहीं, लेकिन ईसाइयों को निशाना बनाने के लिए आत्मघाती हमला होना बड़े खतरे का संकेत है। ऐसा लगता है कि आतंकी संगठन आधार मजबूत करने के लिए ईसाइयों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में न केवल आतंकी संगठन को बल मिलने की आशंका बढ़ गई है बल्कि प्रतिकार में ईसाइयों के भड़कने की भी संभावना है।
नववर्ष पर प्रार्थना कर लौट रहे थे लोग
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हरे रंग की एक स्कॉडा कार मध्यरात्रि के बाद चर्च के बाहर खड़ी करके एक व्यक्ति उतरा। उतरते ही उसने शरीर से बंधे विस्फोटकों में विस्फोट कर लिया। उस वक्त चर्च में नव वर्ष की पहली प्रार्थना समाप्त हुई थी और लोग बाहर आ रहे थे। पादरी के मुताबिक प्रार्थना में करीब एक हजार लोग शामिल हुए थे। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि हमले से ईसाइयों में जबर्दस्त गुस्सा फूटा और उन्होंने पास की एक मस्जिद पर हमला कर दिया। मस्जिद के दरवाजे और खिड़की तोड़ दिए गए। फिर दोनों समुदायों जमकर टकराव हुआ। अल्पसंख्यक ईसाई इसके बाद पुलिस से भी भिड़ गए।
बीते महीनों में ईसाइयों पर हमले बढ़े
बीते कुछ महीनों में इस्लामी चरमपंथियों द्वारा मिस्र समेत नाइजीरिया, इराक और पाकिस्तान में चर्च पर हमलों की घटनाएं हुई हैं। मध्य नाइजीरिया में बीते क्रिसमस की पूर्व संध्या पर दो चर्चो पर हुए हमले हुए थे। इस हिंसा में 38 लोग मारे गए थे। दूसरी ओर 31 अक्टूबर को इराक की राजधानी बगदाद में प्रसिद्ध अवर लेडी ऑफ साल्वेशन चर्च पर आतंकवादियों के हमले में दो पादरियों और सात सुरक्षाकर्मियों के अतिरिक्त 44 ईसाई मारे गए थे। इस हमले की जिम्मेदारी खुद को इराक का अल-कायदा बताने वाले संगठन ने ली थी और जल्दी ही मिस्र के ईसाइयों पर हमले की धमकी दी थी।
नाइजीरिया में भी विस्फोट, 30 मरे
नाइजीरिया की राजधानी अबुजा में सैन्य बैरकों के पास स्थित मैमी बाजार बम विस्फोट के कारण 30 लोगों की मौत हो गई। नव वर्ष की वजह से बाजार में काफी भीड़-भाड़ थी। नागरिक रक्षा कोर के प्रमुख राबी साइदू ने बताया कि शुक्रवार देर रात नामडी आजिकीवी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और न्यान्या क्षेत्र स्थित चर्च के बाहर भी विस्फोट हुए। हालांकि इन दोनों विस्फोटों में किसी के मारे जाने की खबर नहीं है। हमलों के पीछे बोको हरम नाम के इस्लामिक संगठन का हाथ बताया जा रहा है। वैसे औपचारिक रूप से किसी भी आतंकवादी संगठन ने हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि हमले पुलिस के अत्याचार और सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रतिकार स्वरूप किए गए हैं।
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