चीन में ईसाइयत के तेजी से हो रहा प्रचार-प्रसार ने सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए सैद्धांतिक मुश्किल पैदा कर दी है। युवा कार्यकर्ताओं के सामने भ्रम और पहचान के संकट की अजीब स्थिति बन गई है। वे आस्था और राजनीतिक दर्शन के बीच के संघर्ष की स्थिति में खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। पहली बार पार्टी में उत्पन्न इस भ्रम और दुविधा की स्थिति को उजागर करते हुए ग्लोबल टाइम्स ने अपने आलेख में लिखा कि जो पार्टी सदस्य ईसाई बन चुके हैं। उनके सामने विरोधाभासी राजीतिक दर्शन और आस्था के बीच की दुविधा उत्पन्न हो गई है। ग्लोबल टाइम्स चीनी सत्ताधारी दल के मुखपत्र पीपुल्स डेली का सहयोगी समाचार पत्र है। एक सच्ची आस्था के नाम से प्रकाशित इस आलेख में युवाओं की दुविधा को चित्रित करने का प्रयास किया गया है, जिन्होंने संस्थापक माओ की मौत के बाद पार्टी की सदस्यता को लेकर उदारता बरते जाने के पश्चात चीन की साम्यवादी पार्टी (सीपीसी) की सदस्यता ली थी। इसमें कहा गया है कि चीन में इस साल ईसाइयों की संख्या करीब दो करोड़ तीस लाख है, जबकि 2009 में साम्यवादी दलों के सदस्यों की संख्या सात करोड़ अस्सी लाख थी और इन दोनों में काफी फर्क है। आलेख में उत्तर-पूर्वी कृषि विश्वविद्यालय की टापर 32 वर्षीय युन जिंग का उदाहरण दिया गया है। उसने कॉलेज के दिनों में वर्ष 2000 में चीनी साम्यवादी दल की सदस्यता ली थी। राजनीति में किसी भी तरह की रुचि नहीं रखने की बात स्वीकार करते हुए युन ने कहा, लोग पार्टी की सदस्यता तभी लेते हैं जब वह कॉलेज में होते हैं और उस समय सब समान होते है। उनकी चाहत भी समान होती हैं। एक बार सदस्यता लेने के बाद आपको नौकरियों में आवेदन और चीन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने को लेकर विशेषाधिकार प्राप्त हो जाते हैं। मैंने भी इसी प्रचलन का अनुसरण किया। उन्होंने बताया, हमें परीक्षा के दौरान साम्यवादी सिद्धांतों के बारे में पूछा गया, लेकिन इस सिद्धांत का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था और इन दिनों तो मैं उसे बिल्कुल भूल चुकी हूं। आलेख में इस प्रसंग के हवाले से कहा गया कि यह पार्टी के लिए समस्या की बात हो सकती है, क्योंकि वह केवल पार्टी की सदस्य नहीं थी बल्कि शाखा सचिव थी। बाद में जब उसके पति ने वर्ष 2007 में बपतिस्मा कराया तो वह खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगी। उसने बताया, मेरी सास और मेरे पति की बहन दोनों प्रोटेस्टैंट ईसाई थे, लेकिन वर्ष 2007 के शुरुआती दिनों में जब मेरे पति ने बपतिस्मा कराया तो इससे मुझे काफी निराशा हुई। मैं एक तरह से अपने को ठगा हुआ महसूस कर रही थी। युन ने कहा कि उसके बाद हमारे बीच रिश्ते में बदलाव आया। हम दोनों एक दूसरे से कटे-कटे से रहने लगे। ऐसा कैसा हो सकता था? वह इतनी आसानी से धर्म परिवर्तन कैसे कर सकता है? उसे मेरी तरह नास्तिक ही होना पड़ेगा। युन ने बताया कि इसके बाद वह अलगाव, उलझन और गुस्से में रहने लगी। जब उसके प्रोटेस्टैंट दोस्त हमारे घर पर जमा होते थे और प्रार्थना करते तो यह एक तरह से मेरे ऊपर दबाव का काम करने लगता। बाद में जब युन ने भी 2008 में धर्म परिवर्तन कर लिया तो उसे पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया गया और अन्य गतिविधियों में भाग लेने से भी रोक दिया। भगवान सभी चीजों की व्यवस्था करता है। मैं तभी अलग होउंगी जब मैं ऐसा कर सकती हूं।
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