Wednesday, May 11, 2011

चमत्कार को नमस्कार क्यों


वर्ष 2005 में दिवंगत हुए पोप जॉन पाल अब आधिकारिक तौर पर संतत्व के करीब पहुंच गए हैं। एक मई को वेटिकन शहर में उन्हें ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किए जाने के बाद यानी बीटिफिकेशन होने के बाद अब उस सिलसिले को भी आरंभ कर दिया जाएगा। वेटिकन शहर के सेंट पीटर्स स्क्वॉयर पर लंबे समय बाद करीब 15 लाख लोग एकत्रित हुए। इस अवसर पर पोप जॉन पाल द्वितीय के ताबूत को बाहर निकाला गया और वर्तमान पोप की अगुआई में प्रार्थना का आयोजन हुआ। समारोह में भाग लेने के लिए तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्ष और गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने टीवी पर इस कार्यक्रम का सजीव प्रसारण देखा तथा तमाम स्थानों पर रैलियों का भी आयोजन हुआ। रोमन कैथोलिक धर्म में संत घोषित करने की पहली शर्त होती है उस व्यक्ति के साथ किसी चमत्कार का प्रमाण पेश करना। इसके बाद बीटिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी होती है अर्थात उसे ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किया जाता है। इसका ऐलान वेटिकन में होता है। इसके बाद उसे संत घोषित किया जाता है, जो कननायजेशन कहलाता हैं। पोप को धन्य घोषित किए जाने का सिलसिला तीन साल पहले आगे बढ़ा था जब फ्रांस की 46 वर्षीय सिस्टर मेरी साइमन पिअरे को पोप का नाम लेने मात्र से पार्किनसंस बीमारी से मिली मुक्ति का विवरण छपा था। तीन बक्सों में भरे दस्तावेजों के बीच वे सैकड़ों कागज भी पेश किए गए। यह कोई पहला मौका नहीं है जब हालिया दौर में हम ईसाई धर्म के मानने वालों को हम धन्य घोषित किए जाते देख रहे हैं। अभी कुछ साल पहले मदर टेरेसा के बीटिफिकेशन से हम रू-ब-रू हुए थे। इसके लिए राईगंज के पास की रहने वाली किन्हीं मोनिका बेसरा से जुड़े चमत्कार का विवरण पेश किया गया था। गौरतलब है कि चमत्कार की घटना की प्रामाणिकता को लेकर सिस्टर्स ऑफ चैरिटी के लोगों ने लंबा चौड़ा 450 पेज का विवरण वेटिकन को भेजा था। यह प्रचारित किया गया था कि मोनिका के ट्यूमर पर जैसे ही मदर टेरेसा के लॉकेट का स्पर्श हुआ वह फोड़ा गायब हो गया। हालांकि खुद मोनिका बेसरा के पति सैकिया मूर्म ने इस पर यकीन नहीं किया और मीडियाकर्मियों को बताया कि किस तरह मोनिका का लंबा इलाज चला था। सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने भी इसकी पुष्टि की थी। हालांकि किसे संत घोषित करना है यह धर्मविशेष का आंतरिक मामला है, लिहाजा इस बारे में टिप्पणी करना उचित नहीं होगा, लेकिन क्या जिन चमत्कारों का हवाला देते हुए संत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है उसकी सत्यता-असत्यता के बारे में कुछ कहना नहीं चाहिए? दरअसल जब इसके लिए कुछ ऐसे पैमाने चुने जाते हैं जिनका संबंध धर्म की आंतरिक गतिविधियों तक नहीं रहता तब चिंता होनी स्वाभाविक ही है। विज्ञान के नियमों से वाकिफ हर शख्स जानता है कि चमत्कार की कई बातें अविश्वसनीय होती हैं। विज्ञान के मुताबिक किसी प्रयोग विशेष को यदि प्रयोगशाला में दोहराया जा सकता है तभी उसकी वैज्ञानिक सत्यता को प्रमाणित माना जा सकता है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि पोप जॉन पॉल को ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किए जाने की आपाधापी में किसी ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि 27 साल के उनके कार्यकाल में पादरियों तथा अन्य चर्च अधिकारियों के संरक्षण में पल-बढ़ रहे हजारों बच्चों के यौन अत्याचार की जो तमाम घटनाएं उजागर हो रही थीं उसके प्रति उन्होंने क्या रुख अख्तियार किया? इसका एक उदाहरण लिजनरीज ऑफ क्राइस्ट के विवादास्पद संस्थापक फादर मार्शियल मेसिल डेगोलाडो को युवाओं के सक्षम दिशानिर्देशक के तौर पर पोप जान पॉल द्वारा नवाजे जाने की घटना का उल्लेख किया जाता है। वेटिकन के सामने यह राज भी खुला था कि किस तरह मार्शियल मेसिल ने तमाम बच्चों या सेमिनारी के अन्य सदस्यों के साथ यौन संबंध कायम किए और तमाम बच्चे भी पैदा किए थे। मगर अंत तक उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। पोप जान पॉल से जुड़ी चमत्कार की घटना एवं उनके कार्यकाल में बाल यौन अत्याचार की घटनाओं के किस्से, बरबस हमें पिछले दिनों दिवंगत हुए हमारे समय के एक चर्चित संत, जिनका उत्तर-दक्षिण दोनों हिस्सों में बोलबाला रहा है तथा जो खुद को महाराष्ट्र में बीती सदी के एक सूफी संत का अवतार मानते हैं, की याद दिलाता है। उनके बारे में भी चमत्कारों की बातें प्रचलित कर दी गई थीं। कहा जाता था कि वह हवा से घड़ी निकालकर अपने भक्तों को भेंट करते हैं या कहीं से अचानक उन्हें सेब प्रसाद के तौर पर देते हैं, लेकिन बाद में इन चमत्कारों की असलियत खुलती गई और फिर उनके इन चमत्कारों की चर्चा भी बंद हो गई। मशहूर रैशनेलिस्ट अब्राहम कोवूर जिन्होंने उम्र भर चमत्कारी बाबाओं की असलियत को लोगों के सामने उजागर किया। इस मामले में उनकी किताब भी मशहूर है जिसका शीर्षक है बीगॉन गोडमेन। कोवूर ने आज से तीस साल पहले एक लाख रुपये का ईनाम रखा था जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति अपने चमत्कारों को प्रमाणित कर देगा उसे वह ईनाम दे दिया जाएगा। चमत्कारों के अलावा सत्य साईं बाबा के संतत्व का एक ज्यादा घृणास्पद एवं खतरनाक पहलू भी उनके जीतेजी उजागर हुआ। बीबीसी ने अपनी एक डाक्युमेंट्री में उन तमाम लोगों को पेश किया जिनके साथ उन्होंने कथित तौर पर यौन अत्याचार किया था। इकोनॉमिक पोलिटिकल वीकली के 27 मार्च, 2004 के लेख में रिलीजन अंडर ग्लोबलाइजेशन में पी. राधाकृष्णन ने सत्य साई के जीवन से जुड़ी ऐसी तमाम घटनाओं को उजागर किया। यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि लाखों लोगों की मौजूदगी के बीच पोप जॉन पाल द्वितीय को दिव्य घोषित करने का प्रसंग हो या सत्य साई बाबा की बात हो, हम सहज समझ सकते हैं कि ऐसी घटनाएं हमारी सार्वजनिक तर्कबुद्धि पर सवाल खडे़ करती हैं। यह सब हमारी अंधश्रद्धा को बढ़ाने का ही काम करती हैं। हिंदुस्तान में निरक्षरता का जो आलम है तथा पढ़े-लिख्ेा लोगों में भी वैज्ञानिक मिजाज की कमी है उसे गणेशजी को दूध पिलाने के प्रसंग के रूप में पूरे मुल्क में देखा गया था। हिंदुस्तान के समाज और सियासी हालात पर एक सरसरी निगाह डालने से भी अंदाजा हो जाएगा कि यहां न चमत्कार चाहने वालों की कमी है और न ही चमत्कार दिखाने वाले लोगों की। अगर ऐसा नहीं होता तो पूरे मुल्क में 80 लाख से ज्यादा ऐसे छोटे-बड़े साधु नहीं दिखाई देते। पोप जॉन पाल हों या अन्य धर्मगुरु उनके बारे में आदर प्रगट करना अपनी-अपनी आस्था का मामला हो सकता है, लेकिन क्या 21वीं सदी में इस बहाने हम चमत्कारों को वैधता प्रदान कर सकते हैं और दूसरे क्या इस तरह की फैलाई जा रही अंधविश्वासमूलक प्रवृत्तियों को मान्यता देकर हम वास्तविकता से मुंह फेर सकते हैं। इन प्रश्नों पर सभी को विचार करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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