वर्ष 2005 में दिवंगत हुए पोप जॉन पाल अब आधिकारिक तौर पर संतत्व के करीब पहुंच गए हैं। एक मई को वेटिकन शहर में उन्हें ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किए जाने के बाद यानी बीटिफिकेशन होने के बाद अब उस सिलसिले को भी आरंभ कर दिया जाएगा। वेटिकन शहर के सेंट पीटर्स स्क्वॉयर पर लंबे समय बाद करीब 15 लाख लोग एकत्रित हुए। इस अवसर पर पोप जॉन पाल द्वितीय के ताबूत को बाहर निकाला गया और वर्तमान पोप की अगुआई में प्रार्थना का आयोजन हुआ। समारोह में भाग लेने के लिए तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्ष और गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने टीवी पर इस कार्यक्रम का सजीव प्रसारण देखा तथा तमाम स्थानों पर रैलियों का भी आयोजन हुआ। रोमन कैथोलिक धर्म में संत घोषित करने की पहली शर्त होती है उस व्यक्ति के साथ किसी चमत्कार का प्रमाण पेश करना। इसके बाद बीटिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी होती है अर्थात उसे ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किया जाता है। इसका ऐलान वेटिकन में होता है। इसके बाद उसे संत घोषित किया जाता है, जो कननायजेशन कहलाता हैं। पोप को धन्य घोषित किए जाने का सिलसिला तीन साल पहले आगे बढ़ा था जब फ्रांस की 46 वर्षीय सिस्टर मेरी साइमन पिअरे को पोप का नाम लेने मात्र से पार्किनसंस बीमारी से मिली मुक्ति का विवरण छपा था। तीन बक्सों में भरे दस्तावेजों के बीच वे सैकड़ों कागज भी पेश किए गए। यह कोई पहला मौका नहीं है जब हालिया दौर में हम ईसाई धर्म के मानने वालों को हम धन्य घोषित किए जाते देख रहे हैं। अभी कुछ साल पहले मदर टेरेसा के बीटिफिकेशन से हम रू-ब-रू हुए थे। इसके लिए राईगंज के पास की रहने वाली किन्हीं मोनिका बेसरा से जुड़े चमत्कार का विवरण पेश किया गया था। गौरतलब है कि चमत्कार की घटना की प्रामाणिकता को लेकर सिस्टर्स ऑफ चैरिटी के लोगों ने लंबा चौड़ा 450 पेज का विवरण वेटिकन को भेजा था। यह प्रचारित किया गया था कि मोनिका के ट्यूमर पर जैसे ही मदर टेरेसा के लॉकेट का स्पर्श हुआ वह फोड़ा गायब हो गया। हालांकि खुद मोनिका बेसरा के पति सैकिया मूर्म ने इस पर यकीन नहीं किया और मीडियाकर्मियों को बताया कि किस तरह मोनिका का लंबा इलाज चला था। सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने भी इसकी पुष्टि की थी। हालांकि किसे संत घोषित करना है यह धर्मविशेष का आंतरिक मामला है, लिहाजा इस बारे में टिप्पणी करना उचित नहीं होगा, लेकिन क्या जिन चमत्कारों का हवाला देते हुए संत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है उसकी सत्यता-असत्यता के बारे में कुछ कहना नहीं चाहिए? दरअसल जब इसके लिए कुछ ऐसे पैमाने चुने जाते हैं जिनका संबंध धर्म की आंतरिक गतिविधियों तक नहीं रहता तब चिंता होनी स्वाभाविक ही है। विज्ञान के नियमों से वाकिफ हर शख्स जानता है कि चमत्कार की कई बातें अविश्वसनीय होती हैं। विज्ञान के मुताबिक किसी प्रयोग विशेष को यदि प्रयोगशाला में दोहराया जा सकता है तभी उसकी वैज्ञानिक सत्यता को प्रमाणित माना जा सकता है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि पोप जॉन पॉल को ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किए जाने की आपाधापी में किसी ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि 27 साल के उनके कार्यकाल में पादरियों तथा अन्य चर्च अधिकारियों के संरक्षण में पल-बढ़ रहे हजारों बच्चों के यौन अत्याचार की जो तमाम घटनाएं उजागर हो रही थीं उसके प्रति उन्होंने क्या रुख अख्तियार किया? इसका एक उदाहरण लिजनरीज ऑफ क्राइस्ट के विवादास्पद संस्थापक फादर मार्शियल मेसिल डेगोलाडो को युवाओं के सक्षम दिशानिर्देशक के तौर पर पोप जान पॉल द्वारा नवाजे जाने की घटना का उल्लेख किया जाता है। वेटिकन के सामने यह राज भी खुला था कि किस तरह मार्शियल मेसिल ने तमाम बच्चों या सेमिनारी के अन्य सदस्यों के साथ यौन संबंध कायम किए और तमाम बच्चे भी पैदा किए थे। मगर अंत तक उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। पोप जान पॉल से जुड़ी चमत्कार की घटना एवं उनके कार्यकाल में बाल यौन अत्याचार की घटनाओं के किस्से, बरबस हमें पिछले दिनों दिवंगत हुए हमारे समय के एक चर्चित संत, जिनका उत्तर-दक्षिण दोनों हिस्सों में बोलबाला रहा है तथा जो खुद को महाराष्ट्र में बीती सदी के एक सूफी संत का अवतार मानते हैं, की याद दिलाता है। उनके बारे में भी चमत्कारों की बातें प्रचलित कर दी गई थीं। कहा जाता था कि वह हवा से घड़ी निकालकर अपने भक्तों को भेंट करते हैं या कहीं से अचानक उन्हें सेब प्रसाद के तौर पर देते हैं, लेकिन बाद में इन चमत्कारों की असलियत खुलती गई और फिर उनके इन चमत्कारों की चर्चा भी बंद हो गई। मशहूर रैशनेलिस्ट अब्राहम कोवूर जिन्होंने उम्र भर चमत्कारी बाबाओं की असलियत को लोगों के सामने उजागर किया। इस मामले में उनकी किताब भी मशहूर है जिसका शीर्षक है बीगॉन गोडमेन। कोवूर ने आज से तीस साल पहले एक लाख रुपये का ईनाम रखा था जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति अपने चमत्कारों को प्रमाणित कर देगा उसे वह ईनाम दे दिया जाएगा। चमत्कारों के अलावा सत्य साईं बाबा के संतत्व का एक ज्यादा घृणास्पद एवं खतरनाक पहलू भी उनके जीतेजी उजागर हुआ। बीबीसी ने अपनी एक डाक्युमेंट्री में उन तमाम लोगों को पेश किया जिनके साथ उन्होंने कथित तौर पर यौन अत्याचार किया था। इकोनॉमिक पोलिटिकल वीकली के 27 मार्च, 2004 के लेख में रिलीजन अंडर ग्लोबलाइजेशन में पी. राधाकृष्णन ने सत्य साई के जीवन से जुड़ी ऐसी तमाम घटनाओं को उजागर किया। यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि लाखों लोगों की मौजूदगी के बीच पोप जॉन पाल द्वितीय को दिव्य घोषित करने का प्रसंग हो या सत्य साई बाबा की बात हो, हम सहज समझ सकते हैं कि ऐसी घटनाएं हमारी सार्वजनिक तर्कबुद्धि पर सवाल खडे़ करती हैं। यह सब हमारी अंधश्रद्धा को बढ़ाने का ही काम करती हैं। हिंदुस्तान में निरक्षरता का जो आलम है तथा पढ़े-लिख्ेा लोगों में भी वैज्ञानिक मिजाज की कमी है उसे गणेशजी को दूध पिलाने के प्रसंग के रूप में पूरे मुल्क में देखा गया था। हिंदुस्तान के समाज और सियासी हालात पर एक सरसरी निगाह डालने से भी अंदाजा हो जाएगा कि यहां न चमत्कार चाहने वालों की कमी है और न ही चमत्कार दिखाने वाले लोगों की। अगर ऐसा नहीं होता तो पूरे मुल्क में 80 लाख से ज्यादा ऐसे छोटे-बड़े साधु नहीं दिखाई देते। पोप जॉन पाल हों या अन्य धर्मगुरु उनके बारे में आदर प्रगट करना अपनी-अपनी आस्था का मामला हो सकता है, लेकिन क्या 21वीं सदी में इस बहाने हम चमत्कारों को वैधता प्रदान कर सकते हैं और दूसरे क्या इस तरह की फैलाई जा रही अंधविश्वासमूलक प्रवृत्तियों को मान्यता देकर हम वास्तविकता से मुंह फेर सकते हैं। इन प्रश्नों पर सभी को विचार करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
संवादसेतु-चर्च एवं धर्मांतरण
Wednesday, May 11, 2011
Saturday, April 16, 2011
विरोध के बाद रुकी मप्र में ईसाइयों की गिनती
मध्य प्रदेश में रह रहे ईसाइयों की गतिविधियों व उनके काम-धंधों की जानकारी जुटाने के लिए पुलिस के माध्यम से कराए जा रहे सर्वेक्षण को समाज द्वारा उठाई गई आपत्ति के बाद रोकना पड़ा है। इस मामले में पुलिस के आला अधिकारी मौन हैं, लेकिन ईसाई समाज इसे अपना अपमान बता रहा है। सूत्रों की मानें तो पुलिस मुख्यालय ने पिछले महीने राज्य के सभी थानाध्यक्षों को आदेश दिया था कि वे अपने क्षेत्र में चलने वाली ईसाई गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटा कर भेजें। इस जानकारी में पुलिस को यह भी बताना था कि उनके क्षेत्र में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट समुदायों की वास्तविक जनसंख्या क्या है। इनकी आय का जरिया क्या है। इन्हें विदेशों से पैसा मिलता है या नहीं। साथ ही पुलिस को यह भी बताने को कहा था कि इनके राजनीतिक दृष्टिकोण, आपराधिक रिकार्ड और शिक्षा के स्तर की जानकारी भी जुटाई जाए। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस के प्रवक्ता फादर आनंद मुंटूगल ने राज्य पुलिस की आलोचना करते हुए कहा कि ईसाइयों का अपराधियों की तरह से लेखा-जोखा रखा जा रहा है, जो आपत्तिजनक है|
Wednesday, February 9, 2011
Thursday, February 3, 2011
फिर मुद्दा बनता मतांतरण
मध्य प्रदेश के ईसाई समुदाय एक बार फिर सशंकित है। ईसाई संगठन के नेताओं ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा 10, 11 और 12 फरवरी को मंडला में आयोजित किए जा रहे मां नर्मदा सामाजिक कुंभ को लेकर अपनी आशंकाएं जताई हैं। आयोजन में लगभग 20 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है। मंडला वह इलाका है जहां बड़े पैमाने पर मतांतरण हुआ है। ईसाई संगठनों को आशंका है इस आयोजन के बहाने संघ परिवार के लोग उनके लोगों को आतंकित कर सकते हैं या उन्हें पुन: स्वधर्म में वापसी के लिए दबाव बना सकते हैं। मतांतरण का सवाल इसलिए भी सतह पर आ गया है, क्योंकि स्टेंस मामले में पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट ने अपने निर्णय में संसोधन किया। मंडला आदिवासी बहुल जिला है और इस इलाके में मतांतरित लोगों की संख्या बहुत है। इस संदर्भ में ईसाई संगठनों की चिंता खारिज नहीं की जा सकती। संघ परिवार ने इस आयोजन के लिए पूरी ताकत झोंक दी है किंतु आदिवासी समाज के वास्तविक सवालों को संबोधित क्यों नहीं किया जा रहा है? आदिवासियों की जिंदगी का मूल प्रश्न है आज उन्हें उनकी जमीनों, जंगलों और जड़ों से विस्थापित किया जाना। इसी के साथ नक्सलवाद की समस्या भी उनके सामने है। बाजारवादी समय में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे इस समाज के मूल प्रश्नों सें हटकर आखिर मतांतरण जैसे सवालों से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? बेहतर होता कि संघ परिवार इस महा आयोजन के बहाने माओवादी आतंकवाद के खिलाफ एक संकल्प पारित करता और जल, जंगल, जमीन से आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ कुछ सार्थक फैसले लेता। मतांतरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की कुछ उन प्राथमिक चिंताओं में है, जो उसके प्रमुख एजेंडे पर हैं। यह दुख कहीं-कहीं हिंसक रूप भी ले लेता है तो कहीं गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी बनता है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रेरित वनवासी कल्याण आश्रम और सेवा भारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आदिवासियों, गिरिजनों एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से इंकार करते हैं कि उनकी सेवा भावना के साथ मतांतरण का लोभ भी जुड़ा हुआ है, लेकिन विहिप और संघ परिवार इन तर्को को खारिज करता है। आज मतांतरण की यह बहस ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही हैं और तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर मतांतरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेघालय, नागालैंड के ताजा हालात तथा कश्मीर में मुस्लिमों की बहुलता के कारण पैदा हुई परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को आधार दिया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि हिंदू मानस में एक भय का वातारण बनाती है। इन निष्कर्षो का फलितार्थ हम उड़ीसा की दारा सिंह घटना के रूप में देख चुके हैं। दारा सिंह हिंदूवादी प्रतिवादी प्रतिक्रिया का चरम रूप है। पहले लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शो, बहसों और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गो की तलाश इसी कोशिश का हिस्सा था वहां भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय और धर्म परिवर्तन की घटना है जो उसके द्वारा की गई हिंसा के ग्लानि से उपजा। बाद के दिनों में भीमराव अंबेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकारोक्ति एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्राह्मण पुजारी बन गए। भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के बदलाव के कारण होता रहा इसलिए यह टकराव का कारण नहीं बना। 981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिया। सामंतों और बड़ी जातियों के अत्याचार से त्रस्त लोगों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े कर दिए। सही अर्थो में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को एक नया रूप देने में सफल रही। इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि धार्मिक व जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर खड़े हो सकते हैं। इसी समय महाराष्ट्र में करीब 3 लाख दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। 26 जनवरी 1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया, लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया, क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते। परंतु मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मातरण की घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया। संघ परिवार ने धर्म बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की जिसमें दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए। इस सबके साथ ईसाई मिशनों की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष के रूप में सामने आया। कुछ समय पहले इसका इस्तेमाल कर पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए चर्चो में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजुमन के कार्यकर्ताओं के रूप में हो चुकी है। पूर्वांचल के राज्यों में आइएसआइ प्रेरित आतंकियों से चर्च के रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर नारेबाजियों के बजाय ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी हक है, लेकिन इस प्रश्न से पीडि़त जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी अमानवीय जाति प्रथा और पाखंड के खिलाफ शुरू करें। समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ जंग तेज करनी होगी। मतांतरण जैसे प्रश्नों के मूल में अपमान, तिरस्कार उपेक्षा और शोषण है। इन्हें समाप्त करने के साथ-साथ वंचितों के दुख-दर्द को भी दूर करना होगा। इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर चुनौती के रूप में इसे स्वीकारना भी चाहिए। जाहिर है इस लड़ाई को दारा सिंह के तरीके से नहीं जीता जा सकता। इसके दो ही मंत्र हैं- सेवा और सद्भाव। मंडला में 20 लाख लोगों को जुटाकर आरएसएस अगर आदिवासियों के सवालों पर विचार नहीं करता तो केवल धर्मातरण का मुद्दा इसे सार्थक नहीं बना पाएगा।
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