Thursday, February 3, 2011

फिर मुद्दा बनता मतांतरण


मध्य प्रदेश के ईसाई समुदाय एक बार फिर सशंकित है। ईसाई संगठन के नेताओं ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा 10, 11 और 12 फरवरी को मंडला में आयोजित किए जा रहे मां नर्मदा सामाजिक कुंभ को लेकर अपनी आशंकाएं जताई हैं। आयोजन में लगभग 20 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है। मंडला वह इलाका है जहां बड़े पैमाने पर मतांतरण हुआ है। ईसाई संगठनों को आशंका है इस आयोजन के बहाने संघ परिवार के लोग उनके लोगों को आतंकित कर सकते हैं या उन्हें पुन: स्वधर्म में वापसी के लिए दबाव बना सकते हैं। मतांतरण का सवाल इसलिए भी सतह पर आ गया है, क्योंकि स्टेंस मामले में पिछले दिनों सुप्रीमकोर्ट ने अपने निर्णय में संसोधन किया। मंडला आदिवासी बहुल जिला है और इस इलाके में मतांतरित लोगों की संख्या बहुत है। इस संदर्भ में ईसाई संगठनों की चिंता खारिज नहीं की जा सकती। संघ परिवार ने इस आयोजन के लिए पूरी ताकत झोंक दी है किंतु आदिवासी समाज के वास्तविक सवालों को संबोधित क्यों नहीं किया जा रहा है? आदिवासियों की जिंदगी का मूल प्रश्न है आज उन्हें उनकी जमीनों, जंगलों और जड़ों से विस्थापित किया जाना। इसी के साथ नक्सलवाद की समस्या भी उनके सामने है। बाजारवादी समय में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे इस समाज के मूल प्रश्नों सें हटकर आखिर मतांतरण जैसे सवालों से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? बेहतर होता कि संघ परिवार इस महा आयोजन के बहाने माओवादी आतंकवाद के खिलाफ एक संकल्प पारित करता और जल, जंगल, जमीन से आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ कुछ सार्थक फैसले लेता। मतांतरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की कुछ उन प्राथमिक चिंताओं में है, जो उसके प्रमुख एजेंडे पर हैं। यह दुख कहीं-कहीं हिंसक रूप भी ले लेता है तो कहीं गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी बनता है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रेरित वनवासी कल्याण आश्रम और सेवा भारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आदिवासियों, गिरिजनों एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से इंकार करते हैं कि उनकी सेवा भावना के साथ मतांतरण का लोभ भी जुड़ा हुआ है, लेकिन विहिप और संघ परिवार इन तर्को को खारिज करता है। आज मतांतरण की यह बहस ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही हैं और तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर मतांतरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेघालय, नागालैंड के ताजा हालात तथा कश्मीर में मुस्लिमों की बहुलता के कारण पैदा हुई परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को आधार दिया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि हिंदू मानस में एक भय का वातारण बनाती है। इन निष्कर्षो का फलितार्थ हम उड़ीसा की दारा सिंह घटना के रूप में देख चुके हैं। दारा सिंह हिंदूवादी प्रतिवादी प्रतिक्रिया का चरम रूप है। पहले लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शो, बहसों और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गो की तलाश इसी कोशिश का हिस्सा था वहां भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मसमाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय और धर्म परिवर्तन की घटना है जो उसके द्वारा की गई हिंसा के ग्लानि से उपजा। बाद के दिनों में भीमराव अंबेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकारोक्ति एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्राह्मण पुजारी बन गए। भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के बदलाव के कारण होता रहा इसलिए यह टकराव का कारण नहीं बना। 981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिया। सामंतों और बड़ी जातियों के अत्याचार से त्रस्त लोगों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े कर दिए। सही अर्थो में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को एक नया रूप देने में सफल रही। इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि धार्मिक व जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर खड़े हो सकते हैं। इसी समय महाराष्ट्र में करीब 3 लाख दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। 26 जनवरी 1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया, लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया, क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते। परंतु मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मातरण की घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया। संघ परिवार ने धर्म बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की जिसमें दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए। इस सबके साथ ईसाई मिशनों की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष के रूप में सामने आया। कुछ समय पहले इसका इस्तेमाल कर पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए चर्चो में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजुमन के कार्यकर्ताओं के रूप में हो चुकी है। पूर्वांचल के राज्यों में आइएसआइ प्रेरित आतंकियों से चर्च के रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर नारेबाजियों के बजाय ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी हक है, लेकिन इस प्रश्न से पीडि़त जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी अमानवीय जाति प्रथा और पाखंड के खिलाफ शुरू करें। समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ जंग तेज करनी होगी। मतांतरण जैसे प्रश्नों के मूल में अपमान, तिरस्कार उपेक्षा और शोषण है। इन्हें समाप्त करने के साथ-साथ वंचितों के दुख-दर्द को भी दूर करना होगा। इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर चुनौती के रूप में इसे स्वीकारना भी चाहिए। जाहिर है इस लड़ाई को दारा सिंह के तरीके से नहीं जीता जा सकता। इसके दो ही मंत्र हैं- सेवा और सद्भाव। मंडला में 20 लाख लोगों को जुटाकर आरएसएस अगर आदिवासियों के सवालों पर विचार नहीं करता तो केवल धर्मातरण का मुद्दा इसे सार्थक नहीं बना पाएगा।


ईसाई मतांतरण का सच


लेखक ग्राहम स्टेंस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सतह पर आई मतांतरण की बहस आगे बढ़ा रहे हैं

हाल के दिनों की दो घटनाओं से चर्च द्वारा किए जाने वाले मतांतरण के पीछे छिपा वीभत्स सत्य एक बार फिर रेखांकित हुआ है। उसके साथ-साथ तथाकथित सेकुलर मीडिया ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को जनता के सामने जिस तरह अतिरंजित कर पेश करता है उसका भी खुलासा हुआ है। सन् 2008 में कर्नाटक के कुछ गिरजाघरों में तोड़फोड़ की घटनाएं हुई थीं। सेकुलरिस्ट दलों और मीडिया ने इन घटनाओं के लिए संघ परिवार और भाजपा की नवनिर्वाचित प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया था। न्यायाधीश सोमशेखर की अध्यक्षता में गठित न्यायिक आयोग ने जांच में पाया कि इन घटनाओं के पीछे संघ या सरकार का कोई हाथ नहीं है। सरकार को सौंपी रिपोर्ट में बताया गया है कि ये घटनाएं इसलिए घटीं, क्योंकि ईसाई मत के कुछ संप्रदायों ने हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ में अपमानजनक साहित्य वितरण किया था। भड़काऊ साहित्य का मकसद हिंदुओं में अपने धर्म के प्रति विरक्ति पैदा करना था। इस जांच ने यह भी स्थापित किया कि भड़काने वाली हिंदू विरोधी गतिविधि में कैथोलिक चर्च का कोई हाथ नहीं था। चर्च की कार्यप्रणाली पर पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने भी चिंता प्रकट की है। सर्वोच्च न्यायालय ने आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो पुत्रों को जिंदा जलाने के मामले की सुनवाई करते हुए ईसाई मतप्रचार को लेकर जो बेबाक टिप्पणी की थी उसे ईसाई मतावलंबियों की भावनाओं का स्वत: संज्ञान लेते हुए वापस ले लिया है, किंतु संशोधित फैसले से भी चर्च के मतप्रचार और कार्यशैली पर चिंता स्पष्ट झलकती है। अपने पहले के फैसले में विज्ञ न्यायाधीश पी सदाशिवम और बलबीर सिंह चौहान की खंडपीठ ने कहा था,गरीब आदिवासियों का मतांतरण कराने वाले ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाने केलिए जला दिया गया था। किसी के धार्मिक विश्वास के साथ किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना गलत है। किसी के साथ जबर्दस्ती करके अथवा बरगलाकर उसका धर्म परिवर्तन करने को सही नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय की टिप्पणी पर मिशनरियों ने कड़ी आपत्ति व्यक्त की थी, किंतु यह स्थापित सत्य है कि विदेशी धन के बूते चर्च दलितों-वंचितों व आदिवासियों के बीच छलफरेब से ईसाइयत के प्रचार-प्रसार में संलग्न है। इस अनुचित कार्यशैली पर जब भी प्रश्न खड़ा किया जाता है, चर्च और उसके समर्थक सेकुलरिस्ट उपासना की स्वतंत्रता का शोर मचाने लगते हैं। किसी भी सभ्य समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रोजी-रोटी कमाने के अधिकार के नाम पर वेश्यावृत्ति की छूट नहीं दी जा सकती। उसी तरह उपासना के अधिकार के नाम पर लालच और धोखे से किसी के मजहब परिवर्तन की भी इजाजत नहीं होनी चाहिए। यदि देह का व्यापार अनैतिक है तो यह और भी घृणित और निंदनीय है। सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा था वह मिशनरी मतप्रचार को लेकर महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों के अनुरूप ही था। बाल्यावस्था में ही गांधीजी ने स्कूलों के बाहर मिशनरियों को हिंदू देवी-देवताओं के लिए गालियां देते सुना था। बहुत अध्ययन के बाद उन्होंने चर्च के मतप्रचार पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा था,यदि वे पूरी तरह से मानवीय कायरें और गरीबों की सेवा करने के बजाय डॉक्टरी सहायता, शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करेंगे तो मैं उन्हें निश्चय ही चले जाने को कहूंगा। प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य किसी राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है। निश्चय ही भारत का धर्म यहां के लोगों के लिए पर्याप्त है। हमें धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है। मई, 1935 में एक मिशनरी नर्स ने गांधीजी से पूछा था कि क्या आप मतांतरण के लिए मिषनरियों के भारत आगमन पर रोक लगा देना चाहते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा था, अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा खेल ही बंद करा दूं। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिंदू परिवारों में, जहां मिशनरी पैठे हैं, वेशभूषा, रीतिरिवाज और खानपान तक में अंतर आ गया है। मध्य प्रदेश में मिशनरी गतिविधियों की शिकायतों को देखते हुए इन आरोपों की जांच के लिए 14 अप्रैल, 1955 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पूर्व न्यायाधीष डॉ. भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति ने जांच के लिए 14 जिलों के सैकड़ों स्थानों पर जाकर लोगों से पूछताछ की और उनके बयान लिए थे। 77 ईसाई केंद्रों का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया गया। जांच-पड़ताल में अपने विरुद्ध प्रमाण जाते देख जांच में सहयोग न करके चर्च ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर समिति की कार्यवाही रोकने का प्रयास किया। चर्च की अपील न्यायालय ने खारिज कर दी थी। अंतत: 1956 में 1500 पृष्ठों की रिपोर्ट समिति ने जारी की। समिति की प्रमुख संस्तुतियां मतांतरण के उद्देश्य से आए विदेशी मिशनरियों को बाहर निकालना और उनके पर पाबंदी लगाने की थी। समिति ने यह भी संस्तुति की थी कि भारतीय ईसाई विदेशी आश्रय छोड़कर स्वतंत्र संयुक्त भारतीय चर्च की स्थापना करें। बल प्रयोग, लालच, धोखाधड़ी, अनुचित श्रद्धा, अनुभवहीनता, मानसिक दुर्बलता का उपयोग मतांतरण के लिए नहीं हो। देश के अन्य भागों में गठित समितियों ने भी नियोगी आयोग की संस्तुतियों को उचित ठहराया है। इसलिए अदालत की हाल की टिप्पणी पर चर्च और सेकुलरिस्टों का स्यापा एक स्थापित सच को नकारने से ज्यादा कुछ नहीं है। क्या चर्च अपनी संकीर्णताओं से उबर कर हिंदुत्व के बहुदेववाद के सत्य को भी स्वीकार करेगा? क्या छलकपट और फरेब के बल पर मत परिर्वतन की अनुमति देकर कोई समाज अपनेआप को नैतिक और सभ्य कहला सकता है? (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)